“भारतीय स्वातन्त्र्य समर का अमर ध्रुवतारा वीर सावरकर” : दिलीप निराला,राजनीतिक एवं आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ.

सावरकर माने तेज….

सावरकर माने त्याग….

सावरकर माने तप…..

सावरकर माने तत्व…..

सावरकर माने तर्क……

सावरकर माने तारुण्य…..

सावरकर माने तीर……

सावरकर माने तलवार…..

सावरकर माने विजय….

सावरकर माने समर्पण…

 स्वातन्त्र्य वीर सावरकर को अपनी श्रद्धा सुमन भारत रत्न पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इन शब्दों में व्यक्त करते हुए वीर सावरकर के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को देश के समक्ष रखा था. “वीर सावरकर भारतीय स्वातन्त्र्य समर के ऐसे नायक हैं जिन्हें अंग्रेजों ने तो काला पानी की सजा के दौरान शारीरिक यातना देने की कोई सीमा न रखी तथा स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद मैकाले के मानस पुत्रों एवं ए ओ ह्यूम के वंशजों ने मानसिक यातना देना जारी रखा. स्वातन्त्र्य वीर विनायक दामोदर सावरकर से अंग्रेज तो डरते ही थे लेकिन उनसे कांग्रेस पार्टी आज भी डरती है. वीर सावरकर ने देश के लिए 10 वर्ष तक कालापानी की सजा काटी. अपनी पूरी जिंदगी देश के लिए समर्पित कर दिया.

स्वर्गीय अअटल बिहारी वाजपेयी,पूर्व प्रधानमंत्री

भारत पर शासन करनेवाले अंग्रेज और कांग्रेस की सोच में इतनी समानता क्यों है ? क्या कांग्रेस के नेता… वीर सावरकर का अपमान इसलिए कर रहे हैं… क्योंकि वो कांग्रेस पार्टी के मुख्य विरोधी दल बीजेपी के आदर्श पुरुष हैं ? लेकिन उनकी वीर गाथा और समाज सुधार के बारे में बताने के लिए इतना कुछ है कि इसपर कई किताबें लिखी जा सकती हैं.. लेकिन कांग्रेस और उसके दरबारी इतिहासकारों ने हमेशा वीर सावरकर जैसे महानायकों का सच छिपाया है… देश की आज़ादी में उनके योगदान को कम करके दिखाने की कोशिश की है.

वीर सावरकर

वर्ष 1906 से 1910 के बीच ही सावरकर ने The Indian War of Independence, 1857 नामक एक किताब लिखी थी. इसमें उन्होंने 1857 के विद्रोह को अंग्रेज़ों के खिलाफ पहला स्वतंत्रता संग्राम कहा था. अंग्रेजों ने इस किताब पर प्रतिबंध लगा दिया था. मार्च 1910 में वीर सावरकर को ब्रिटिश सरकार के खिलाफ हिंसा और युद्ध भड़काने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया. वीर सावरकर पर मुकदमा चलाया गया और वर्ष 1911 में अंडमान द्वीप में 10 वर्षों तक कालापानी की सज़ा दी गई. यहां उन्हें अंग्रेजों के अत्याचार झेलने पड़े और ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि वो… भारत का असली इतिहास देश के लोगों को बताना चाहते थे. लेकिन आज़ादी से पहले अंग्रेज सरकार और स्वतंत्रता मिलने के बाद कांग्रेस सरकार ने कुछ महापुरुषों के योगदान को कम करके दिखाया.

क्रांतिकारियों और महापुरुषों के बारे में आधी अधूरी जानकारियां देश के सामने नहीं आनी चाहिए. क्योंकि कोई भी देश अपने इतिहास… संस्कृति और विरासत पर गर्व किए बिना आगे नहीं बढ़ सकता है. भारत के 135 करोड़ लोगों को अपना असली इतिहास जानने का हक है… इसलिए देश का इतिहास नए सिरे से लिखा जाना चाहिए. जिसमें किसी महापुरुष या क्रांतिकारी के साथ कोई भेदभाव ना हो… उनके योगदान को आजादी के दूसरे महानायकों के मुकाबले कम ना किया गया हो.आजादी से जुड़ा एक ऐसा ग्रंथ हो.. जिसे पढ़कर हम अपने असली देशप्रेमियों की पहचान कर सकें . इसमें सिर्फ सत्य की खोज करके उसे उचित स्थान दिया जाए. ये देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देनेवालों को सच्ची श्रद्धांजलि होगी. इससे आनेवाली पीढ़ियों को प्रेरणा भी मिलेगी और उनमें राष्ट्रीय स्वाभिमान की भावना का संचार होगा.

सवाल ये उठता है कि सिर्फ 28 वर्ष की उम्र में सावरकर को 50 वर्ष तक कालापानी की सजा क्यों मिली ? महात्मा गांधी के भारत आने से पहले वीर सावरकर देश के क्रांतिकारियों के प्रेरणास्रोत बन चुके थे. अंग्रेजों के खिलाफ इस विद्रोह के कारण सावरकर को जितनी सजा मिली… उसका 25 प्रतिशत भी महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के हिस्से में कभी नहीं आया था.693 कमरों वाली अंडमान के सेल्युलर जेल में कैदियों के रहने की जगह बहुत छोटी हुआ करती थी….रोशनी के लिए सिर्फ एक छोटा सा रोशनदान होता था. क्रांतिकारियों को वहां पर तरह-तरह की यातनाएं दी जाती थीं, उन्हें बेड़ियों से बांधा जाता था. उनसे कोल्हू से तेल निकालने का काम करवाया जाता था. वहां हर कैदी को एक निश्चित समय में करीब साढ़े तेरह किलो नारियल और सरसों से तेल निकालना होता था.और अगर कोई ऐसा नहीं कर पाता था….तो उसे बुरी तरह पीटा जाता था और बेड़ियों से जकड़ दिया जाता था. अंग्रेज़ बहुत निर्दयी थे और हमेशा भारतीय लोगों के सम्मान पर चोट करते रहते थे। भारतीय क़ैदियों को गंदे बर्तनों में खाना दिया जाता था। उन्हें पीने का पानी भी सीमित मात्रा में मिलता था। कैदियों के पैर हमेशा ज़ंजीरों में बंधे रहते थे. उनके लिए चलना-फिरना और नित्य कर्म करना भी मुश्किल होता था. वीर सावरकर ने इतने मुश्किल हालात के बावजूद काल कोठरी की दीवारों पर 8 से 10 हजार पंक्तियां लिखी थीं. उन्होंने कविताएं लिखने के लिए पत्थर को कलम और जेल की दीवार को कागज की तरह इस्तेमाल किया था. अंग्रेज सरकार वीर सावरकर को यातनाएं देती थी.

जबकि भारत की दूसरी जेलों में बंद जवाहरलाल नेहरू जैसे कैदियों को लिखने पढ़ने की सारी सुविधाएं मिलती थी. उन्हें रोजाना अखबार भी मिलता था. जिससे उन्हें देश और दुनिया की हर-एक खबर मिलती थी. लेकिन अंडमान द्वीप पर बनी इस जेल के चारों तरफ समुद्र था और यहां की यातनाओं से परेशान होकर कई क्रांतिकारियों ने फांसी लगा ली थी.कुछ क्रांतिकारियों ने अनशन भी किया था. लेकिन सावरकर ने आत्महत्या और अनशन को गलत रणनीति बताते हुए जिंदा रहकर और आजाद होकर देश की सेवा करने का रास्ता अपनाया था.

कांग्रेस के हिसाब से आजादी सिर्फ नेहरु-गांधी परिवार ने दिलाई है, अब यदि किसी अन्य स्वतन्त्रता सेनानी को उनसे ज्यादा महत्व मिलने लगेगा तो कांग्रेस की राजनीति पर असर आ जायेगा एवं जनता कांग्रेस से दूर होने लगेगी.आजादी के बाद लम्बे समय तक कांग्रेस सत्ता मे रही और अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए पाठ्य पुस्तकों मे भी कांग्रेस ने नेहरू राज से ही गांधी का अत्यधिक महिमा मंडन किया और उसके बाद नेहरू खानदान का.

पंडित जवाहर लाला नेहरू को जेल की कोठरी में दी जाने वाली सुविधाए

 

अन्य बड़े-बड़े स्वतन्त्रता सेनानियों को कुटिलता पुर्वक नेपथ्य में डाल दिया, और आज भी कांग्रेस यही कोशिश करती रहती है.

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