दलित दंगल को तैयार मायावती और रामविलास.

चक्रपाणि हिमांशु.
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक:
वर्षों से शोषित पीड़ित और उपेक्षित दलित बिरादरी की राजनीतिक महत्वकांक्षा और सत्ता में अधिक हिस्सेदारी की इच्छा जब जोर मारने लगी तब देश की दलित राजनीति हिंदी पट्टी के दो बड़े राज्यों के दलित नेताओं रामविलास पासवान और मायावती के इर्द-गिर्द घूमने लगी…

 

देश के प्रमुख राजनीतिक दलों में कारगर दलित नेतृत्व की कमी का फायदा रामविलास पासवान और मायावती ने उठाया. बसपा के संगठन को कांशीराम ने जिस धर्य और चिंतन से सींचकर दलितों में राजनीतिक चेतना जगाई, उसी चेतना को दर्प और उग्रता से तेज धार देकर उत्तर प्रदेश में मायावती दलितों की इकलौती नेता बन बैठी. बिहार में रामविलास पासवान भी काशीराम की राह चल पड़े. बिहार में 2000 के विधानसभा चुनावों तक दलित राजनीति की अपनी अलग धारा नहीं थी. विभिन्न राजनीतिक दल अपनी अपनी सुविधा के मुताबिक दलित नेताओं के सहयोग से दलित वोट बैंक को अपने अपने पक्ष में करते रहे. इससे पूर्व शुरू में कोई ऐसा इकलौता दलित नेता उभर कर नहीं आया जिसकी दलितों पर पूरी छाप हो. हलाकि दलितों के “ओरनामेंटल” नेता सभी दलों में मौजूद रहे मगर केवल खाना पूर्ति के लिए शोभा की वस्तु बनकर.

कांग्रेस में मीरा कुमार हैं लेकिन वह अपने पिता जगजीवन राम की बुलंदियों के आस-पास भी नहीं फटकती. भाजपा ने बिहार विधान परिषद के सदस्य कामेश्वर चौपाल को दलित बताते हुए उनसे अयोध्या में राम मंदिर की नींव रखवाकर देश के दलितों को यह संदेश देने की कोशिश की थी कि वही दलितों की सबसे बड़ी हितेषी पार्टी है लेकिन दलित वोट बैंक को लुभाने की चाल में तब भाजपा की खूब किरकिरी हुई थी जब चौपाल के दलित होने पर ही सवाल उठ खड़ा हुआ और मामले की पड़ताल में CID तक को हाथ डालना पड़ा था. उस वक्त यह तथ्य सामने आया था की चौपाल खतवे जाति के हैं जो दलितों की श्रेणी में नहीं है.

लालू प्रसाद की राष्ट्रीय जनता दल एवं जदयू जैसी क्षेत्रीय पार्टियां भी क्रमश: रमई राम, श्याम रजक, पितांबर पासवान, महेंद्र बैठा, छेदी पासवान दसईं चौधरी, पूर्णमासी राम एवं ललन पासवान सरीखे कम असर वाले दलित नेताओं के बूते दलित वोट बैंक को लुभाने का प्रयास हमेशा करती रही, लेकिन दलितों पर असर के मामले में रामविलास पासवान सभी नेताओं से आगे निकल गए. रामविलास का नारा “मैं उस घर में दिया जलाने चला हूं जहां सदियों से अंधेरा है” बिहार के दलितों को खूब भाया.

रामविलास क्या दलितों से अँधेरा दूर कर पाएं  :

खुद को डॉक्टर राम मनोहर लोहिया के शिष्य और समाजवादी सोच कि बताने वाले रामविलास पासवान किस हद तक दलितों की जिंदगी से अंधेरा दूर कर पाए यह विवाद का विषय हो सकता है मगर आज की राजनैतिक हकीकत यह है कि रामविलास ने अपनी राजनीतिक सूझबूझ और अवसर के मुताबिक राजनीतिक गठजोड़ के बूटे बिहार की तीसरी राजनीतिक ताकत के रूप में खुद को स्थापित किया इस पथ पर कोई विवाद नहीं हो सकता इतना ही नहीं उन्होंने अपनी हैसियत बिहार के रास्ते चलकर राष्ट्रीय राजनीति में भी पक्की कर ली जिसका असर बाद के दिनों में देखने को मिला.

अपनी इस यात्रा में पासवान ने अवसरों को हमेशा भुनाया. उन्हें अटल बिहारी बाजपेई, लालू प्रसाद और नीतीश कुमार किसी से कभी परहेज नहीं रहा. 1996 का लोकसभा चुनाव लालू प्रसाद की बदौलत जीतने वाले पासवान की भाषा दिल्ली में कदम रखते ही बदल गई. लालू प्रसाद को प्रधानमंत्री पद का ख्वाब दिखाने वाले पासवान ने चारा घोटाला में लालू के फंसते ही उन्हें चारा चोर की उपाधि से विभूषित कर दिया. NDA को सिर का घाव और लालू प्रसाद को पैर का घाव रामविलास पासवान नहीं बताया था. रही बात कांग्रेस की तो कांग्रेस की मुखालफत करते हुए तो रामविलास ने अपनी आधी से अधिक राजनीतिक जिंदगी बिता दी थी.

प्रधानमंत्री अटल वाजपेई ने जब राजग गठबंधन के महत्वपूर्ण दलित नेता रामविलास पासवान का पर संचार मंत्रालय से कतरते हुए उन्हें कोयला मंत्रालय की आग में तपने के लिए छोड़ा था तभी यह संकेत मिलने लगा था कि पासवान कुछ गुल जरुर खिलाएंगे. उत्तर प्रदेश की 2002 की त्रिशंकु विधानसभा और अनिश्चितताओं के राजनीतिक दौर के बाद जब भाजपा ने बसपा नेता मायावती के साथ गलबहियां करने की घोषणा कर दी थी तब देश की दलित राजनीति के दूसरे दिग्गज रामविलास पासवान ने 29 अप्रैल 2002 को गुजरात दंगों में भाजपा की भूमिका को मुद्दा बनाकर अपने 4 सांसदों के साथ राजग से नाता तोड़ते हुए यह बता दिया था कि देश में दलित राजनीति के दंगल की दुंदुंभि बज चुकी है और आने वाले कुछ वर्षों में दलित राजनीति की नैया डगमगाते हुए अपने किनारे को तलाशेगी. 

इसी वक्त बिहार में मायावती की बसपा अपने 5 विधायकों के बूते रावड़ी सरकार को समर्थन दे रही थी. बिहार में बसपा विधायकों की संख्या रामविलास के लिए सर दर्द था. बिहार में बसपा विधायकों की संख्या रामविलास के लिए एक चुनौती थी इस चुनौती से निपटने हुए बसपा के बिहार में अन्य दलित राजनीति पर अंकुश भी पासवान के लिए जरूरी था. हलाकि रामविलास पासवान की यह साध लालू ने पूरी कर दी उन्होंने बसपा के पांचों विधायक को राजद में शामिल करते हुए तीन को राबरी कैबिनेट में मंत्री बनवा दिया था. 

दलितों के सबसे बड़े मसीहा डॉक्टर भीमराव अंबेडकर के निधन के बाद उनके अनुयाई भी नेतृत्व के लिए आपस में खूब लड़े मरे. रिपब्लिकन पार्टी जिस की परिकल्पना डॉक्टर अंबेडकर ने की थी उसका जन्म उनके निधन के बाद हुआ पर उस समय भी अति महत्वकांक्षी दलित नेताओं के कारण सब कुछ बिखर गया. हलाकि आज भी दलितों का एजेंडा देश की राजनीति में हाशिए पर है फिर भी रामविलास पासवान ने अपने आप को बड़े ही सधे हुए कदमों से दलितों के सबसे बड़े हितैषी के रूप में प्रस्तुत किया. 

दलित-मुस्लिम गठजोड़ बनाने की कवायद :

रामविलास पासवान यह अच्छी तरह जानते थे कि केवल दलितों के भरोसे राजनीतिक सत्ता हासिल करना असंभव है इसलिए उन्होंने सामाजिक समीकरणों की तलाश शुरू की. इस प्रक्रिया में दलित-मुस्लिम गठजोड़ बनाने की कवायद भी उन्होंने की. बाद में सवर्णों पर भी डोरे डाले. लालू राबरी राज में वर्षों तक मुसलमान भले ही राजद के वोट बैंक रहे हो मगर उस काल में मुसलमानों का कुछ भला नहीं हो सका. भागलपुर के दंगा पीड़ितों को न्याय नहीं मिला. रावड़ी राज में दंगा के आरोपियों को न केवल सम्मानित किया गया प्रशस्ति पत्र दिए गए बल्कि उन्हें सरकारी संरक्षण भी मुहैया कराया गया. उस समय की तमाम अल्पसंख्यक संस्थान वित्तीय सहायता के अभाव में इसी काल में मृतप्राय हो गई. इन में कोई कार्यरत अल्पसंख्यक कर्मी ख़ुश नहीं रहे. लालू राज में 10 वर्षों तक वेतन से वंचित रहे. मुसलमानों में आक्रोश रहा और वह राजद का विकल्प तलाशते रहे. इस बात को समझने की पहल सबसे पहले रामविलास पासवान ने 2002 में की थी.

गुजरात दंगे के सवाल पर अल्पसंख्यकों के पक्ष में केंद्रीय मंत्रिपरिषद से इस्तीफा पासवान के खाते में दर्ज था. इसी की बदौलत कुछ मुस्लिम संगठनों की मदद से देशभर के मुसलमानों को एक मंच पर लाकर उनकी अगुवाई करने का सपना भी रामविलास पासवान ने 2002 में ही पहली बार देखा था. उस वक्त बसपा छोड़ चुके आरिफ मोहम्मद खान को अपने कार्यक्रमों में साथ रखकर आम अल्पसंख्यकों को यह संदेश देने का प्रयास रामविलास पासवान ने किया था कि अब उनके सच्चे हितैषी सिर्फ वही हैं. अपनी इस योजना पर उन्होंने अच्छा खासा होमवर्क भी किया था.

टुकड़ों में बैठे और अपने अपने हितों के कारण अलग अलग सियासी पार्टियों से जुड़े मुस्लिम संगठनों की हमेशा से यह पीड़ा रही है कि राष्ट्रीय स्तर पर उनका कोई मजबूत संगठन कभी नहीं रहा. इस पीड़ादायक स्थिति से उबरने की अकुलाहट में जब कुछ मुस्लिम संगठनों में राष्ट्रव्यापी मोर्चा बनाने का प्रयास किया तो रामविलास भी उनके पक्ष में खड़े दिखे. इसका मुख्य उद्देश्य यह था कि बिहार सहित देश की मौजूदा राजनीतिक धारा में बदलाव लाना. प्रमुख मुस्लिम संगठन जमीयत उलमा ए हिंद ने 2002 में जब अपना यह प्रयास शुरू किया तब पासवान उनके साथ गंभीरता से जुड़े. पासवान की लोजपा भी मोर्चे की स्थापना के अभियान में शामिल हुई. मौलाना असद मदनी की अध्यक्षता में हुई बैठक में इस प्रस्ताव को स्वीकृति दी गई थी कि प्रस्तावित मोर्चे में अल्पसंख्यकों के अलावा दलितों और पिछड़ों को भी शामिल किया जाएगा और यही रामविलास पासवान चाहते थे. बाद के दिनों में हालांकि ऐसा गठबंधन बहुत अच्छी तरह से आकार नहीं ले सका और बनते-बनते धराशाई हो गया.

रामविलास पासवान के मुस्लिम पटाओ अभियान में रंग दिखाई 2005 के बिहार विधानसभा चुनाव में पासवान की लोजपा राजद और राजग दोनो के लिए सबसे बड़ी चुनौती के रूप में उभरी. धर्मनिरपेक्ष छवि जो लालू प्रसाद की पार्टी राजद की सबसे बड़ी पूंजी थी; उस पर पासवान ने लगातार प्रहार किया. लालू को कटघरे में खड़ा किया. 

चुनावी सभाओं में बार-बार रामविलास ने पूछा गोधरा गोधरा चिल्लाते हैं पूछिए लालू जी से कितनी बार गोधरा गुजरात गए. वह मुसलमानों को बेवकूफ बनाते रहे हैं. दरअसल लोजपा 2005 में मुसलमानों के सामने एक विकल्प के रूप में उभरी. पासवान ने राजद और राजग दोनों के लिए सत्ता शिखर पर पहुंचने वाले गणित को उलट-पुलट कर दिया. मिथिलांचल में लोजपा का खासा दबदबा रहा. दल द्वारा चुनाव परिणाम बाद सत्ता की चाभी पासवान के हाथों में आ गई. उप चुनाव में जदयू से सीटों के तालमेल के प्रस्ताव को भी उन्होंने इस कारण से ठुकरा दिया था कि मुस्लिम मतदाताओं को यह भरोसा दिला सकें कि भाजपा तो दूर NDA के किसी घटक से वे तालमेल करने को राजी नहीं हैं. 

क्षेत्रीय पार्टी होने के वावजूद रामविलास का कद बढ़ा : 

सत्ता की चाबी रामविलास के हाथों में आई तो उन्होंने तय किया कि राजद या राजग दोनों में किसी को समर्थन नहीं देंगे. 243 सदस्य बिहार विधानसभा में 29 विधायक लोजपा के थे. कहा यह भी जाता है कि रामविलास खुद मुख्यमंत्री बनने की जुगत में थे मगर लालू तैयार नहीं हुए. नीतीश ने पेशकश की थी मगर रामविलास को प्रस्ताव भाजपा के कारण रास नहीं आया. अंतिम तारीख 6 मार्च 2005 तक सूबे की किसी भी सियासी पार्टी द्वारा पर्याप्त समर्थन नहीं जुटा पा ने की सूरत में राज्यपाल बूटा सिंह में 12 वीं विधानसभा को भंग करते हुए राज्य में राष्ट्रपति शासन की अनुशंसा कर दी थी. बिहार की गरीब जनता पर दोबारा चुनाव थोपा गया. नवंबर 2005 में पुनः बिहार विधानसभा के चुनाव हुए तब तक लोजपा के विधायक बौखला उठे थे और पार्टी टूट की शिकार हुई. लोजपा के अधिकांश विधायक सूबे के सिंचाई मंत्री रामाश्रय प्रसाद सिंह के नेतृत्व में भाजपा और जदयू की ओर मुखातिब हुए. फरवरी के जिद्द की कीमत रामविलास को नवंबर के चुनाव में चुकानी पड़ी और ताकत विधान सभा में फरवरी चुनाव के मुकाबले आधे से भी कम हो गई. राजग को बहुमत मिला और नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने.बिहार विधानसभा में भाजपा की सीटें भले ही कम हुई हो लेकिन रामविलास की सफलता यह रही कि चुनाव आयोग से लोजपा को क्षेत्रीय पार्टी का दर्जा मिल गया. वोटों के प्रतिशत में वृद्धि हो गई और जाहिर है कि रामविलास पासवान का जनाधार बिहार में बढ़ा. जो जातीय समीकरण रामविलास ने बनाया है उसका असर बिहार में होने वाले किसी भी आगामी चुनाव में दिखाई देती रही और रामविलास इसका फायदा उठाते रहे.

बाद के वर्षों में जब रामविलास पासवान की ताकत बिहार में घटने लगी और लोकसभा चुनाव में हार गए तब उनके सामने एक बार फिर लालू प्रसाद मसीहा बनकर उभरे. लालू प्रसाद ने अपने राजद विधायकों के वोट के बदौलत रामविलास पासवान को राज्यसभा भेजा. दोनों की लंबी दुश्मनी एक बार फिर अच्छी खासी दोस्ती में तब्दील हो गई. रामविलास पासवान लालू के गुण गाने लगे और लालू रामविलास के सहारे दलितों को लुभाने लगे. 

लेकिन वक्त ने करवट ली. 2019 से पहले हवा का रुख बदला. राजनीति बदली. सियासत में मतदाताओं का मिजाज बदला और लोगों का झुकाव भाजपा की तरफ होने लगा. राजद अपने क्रियाकलापों से जंगलराज की छवि लेकर बिहार में बदनाम हो चुका था तो नीतीश कुमार ने दलितों को दलित और महादलित की श्रेणी में बांटकर रामविलास पासवान की ताकत को बहुत ही कमजोर कर दिया था. अब बिहार में दलित श्रेणी में सिर्फ रामविलास पासवान की ही जाति के लोग बचे थे. इसके अलावा सभी दलितों को नीतीश कुमार ने महादलित घोषित कर दिया था. उनकी सुविधाएं बढ़ा दी थी. उनका आरक्षण का कोटा बँट गया और उन्हें सुविधाएं भी मिलने लगी. इस कारण से नीतीश कुमार रामविलास के इस कारण से नीतीश कुमार रामविलास के सबसे बड़े राजनीतिक शत्रु के रूप में उभरे जिन्होंने रामविलास पासवान की राजनीति को बौना बना दिया था. 

अब रामविलास पासवान के सामने अपने दल और अपने कुनबे के अस्तित्व को बचाने की चुनौती थी जिसे नीतीश ने क्षत-विक्षत कर दिया था. लालू प्रसाद ने राज्यसभा में एक सीट देकर उन्हें संजीवनी दे दी थी. इन सबके बावजूद रामविलास पासवान को यह समझते देर नहीं लगी कि गुजरात में भारत के भाग्य विधाता का उदय हो चुका है और नरेंद्र मोदी देश के जनमानस पर छाने लगे हैं. 

अनिश्चय की स्थिति में पड़े रामविलास पासवान को उनके पुत्र चिराग पासवान ने अपने चिराग की रोशनी में रास्ता दिखाया और पिता को एनडीए में शामिल होने के लिए मना लिया. पुत्र चिराग के कहने पर और जोर देने पर रामविलास मान गए और एक बार फिर भाजपा की गोद में जा बैठे. उसी नरेंद्र मोदी से रामविलास ने राजनीतिक गलबहियां कर ली जिनके गुजरात में गोधरा कांड हुआ था और गोधरा कांड के सवाल पर जिन्होंने संसद में अपना मत विपक्ष में देखकर अटल बिहारी बाजपेई की एनडीए की सरकार गिरा दी थी.

नरेंद्र और अमित की जोड़ी को दलित चेहरे की जरूरत : 

अब एक बार फिर अचानक रामविलास पासवान को गोधरा कांड अच्छा लगने लगा. गोधरा कांड के आरोपी श्रेष्ठ लगने लगे. 2014 का लोकसभा चुनाव नजदीक था. सीटों का बंटवारा होने लगा. रामविलास को अपने परिवार और अपने कुनबे के लिए सीटों की दरकार थी. यह बात नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी अच्छी तरह से जानती थी. और नरेंद्र और अमित की जोड़ी को रामविलास के दलित चेहरे की जरूरत थी. इसलिए दोनों में समझौता हो गया. आपसी खींचतान के बाद रामविलास अपने जिन रिश्तेदारों के लिए जितनी सीटें चाहते थे इतनी उन्हें दे दी गई और 2014 के लोकसभा चुनाव में रामविलास एक बार फिर उसी एनडीए का हिस्सा बने जिसकी सरकार को उन्होंने लोकसभा में एक मत से गिरा कर देश पर चुनाव को थोपा था. NDA में रामविलास पासवान की वापसी के बाद लालू प्रसाद ने चुटकी लेते हुए रामविलास को मौसम वैज्ञानिक बताते हुए कहा था कि इस देश में सबसे पहले रामविलास पासवान को यह पता चल जाता है कि सरकार किसकी बनने वाली है. और जिसकी भी सरकार बनने वाली होती है रामविलास उसकी टोली में पहले से ही पहुंच गए होते हैं. अब रामविलास पासवान पिछले 4 वर्षों से NDA की शोभा बढ़ा रहे हैं लेकिन उनकी राजनैतिक ताकत और स्थिति दोनों ही बहुत कमजोर हुई है. अब एक बार फिर NDA में रामविलास का मन कुलबुलाने लगा है. हालांकि वह हमेशा यह कहते हैं कि NDA से उनका नाता अटूट है लेकिन इस देश के नागरिकों को और राजनीतिज्ञों को यह पता है कि भाजपा अगर राजनीति के अखाड़े में लड़खड़ायेगी तो सबसे पहले उसकी डाल से उड़ने वालों में रामविलास पासवान ही होंगे. 

रामविलास पासवान राजनीति की अपनी नई जमीन हमेशा तलाशते रहते हैं और लोगों का कहना है उत्तर प्रदेश के गोरखपुर और फूलपुर चुनाव में भाजपा की करारी और बेइज्जती वाली हार के बाद अब लोगों को यह लगने लगा है कि भाजपा कमजोर हो रही है तो रामविलास पासवान ने भी नए गठबंधन की संभावनाओं की तलाश शुरू कर दी है इस सिलसिले में राजनीतिक पंडितों का कहना है कि रामविलास भीतर-ही-भीतर उपेंद्र कुशवाहा लालू प्रसाद जीतन राम मांझी एवं शरद सरीखे नेताओं के साथ या इन में से कुछ को लेकर राजनीति की नई दशा-दिशा तय करने की जुगत में लगे हैं इस सबके बीच गोधरा वाले अब रामविलास को अच्छे लगने लगे 2014 का लोकसभा चुनाव में दिखा हितों का बंटवारा होने लगा रामविलास को अपने परिवार और अपने को नेगी गुंडे के लिए सीटों की दरकार थी या बात नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी अच्छी तरह से जानती थी और नरेंद्र और अमित की जोड़ी को रामविलास के दलित चेहरे की जरुरत थी और दलित वोटों की ही जरुरत थी इसलिए दोनों में समझौता हो गया आप सी खींच कान के बाद रामविलास अपने जिन रिश्तेदारों के लिए जितनी सीटें चाहते थे उतने उन्हें दे दी गई और 2014 के लोकसभा चुनाव में रामविलास एक बार फिर उसी दीय का हिस्सा बनें जिसकी सरकार को उन्होंने लोकसभा में एकमत से गिरा कर देश पर चुनाव को छुपाने में मिल आसपास खान की वापसी के बाद लालू प्रसाद में चुटकी लेते हुए रामविलास को बेहतरीन मौसम वैज्ञानिक बताते हुए था कि इस देश में सबसे पहले रामविलास पासवान को पता चल जाता है सरकार किसकी बनने वाली है.

अरे एक बार फिर उत्तर प्रदेश के फूलपुर और गोरखपुर में भाजपा की जबरदस्त हार के बाद जब लोगों को यह लगने लगा है कि कहीं भाजपा की स्थिति देश में सियासी तौर पर कमजोर तो नहीं हो रही है; ऐसी स्थिति में रामविलास पासवान ने भी नए रास्ते भीतर ही भीतर तलाशने शुरू कर दिए हैं. अब आने वाले 2019 के लोकसभा चुनाव में राजनीतिक पार्टियों का सियासी गणित क्या होगा और कौन सा गठबंधन किसके साथ बनेगा जब यह तय होने लगेगा उसमें रामविलास पासवान की भूमिका निश्चित रूप से बहुत ही महत्वपूर्ण होगी और देश उनकी भूमिका की प्रतीक्षा कर रहा है.

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